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अगर आप भी हैं इस रोग के शिकार तो सावधान हो जाएँ

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आज एक ऐसी बीमारी की बात, जिससे ज्यादातर नवधनाड्य पैरेंट्स पीड़ित तो हैं लेकिन खुश भी हैं| यह अकेला रोग है, जो लोगों को खुशियाँ दे रहा है| जिसके होने के बावजूद कोई स्वीकार करने तक को तैयार नहीं है| उल्टा अगर कोई अड़ोसी-पदोई, रिश्तेदार ध्यान दिलाये तो उसे पागल करार देने में ऐसे रोगी पीछे नहीं रहते| उन्हें रोग के गंभीर होने का पता तब चलता है जब भैंस पानी में जा चुकी होती है| यह बीमारी है, बच्चों के लालन-पालन में हो रही चूक की| पैसों के दिखावे के चक्कर में अनजाने में ही सही, ऐसी गलतियाँ कर रहे हैं, जिसका दुष्प्रभाव उनके जीवन पर गहरे तक पड़ रहा है लेकिन जब तक वे जागते हैं, देर चुकी होती है| हमारे आसपास अनेक ऐसी कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं| आप आसानी से उनसे बावास्ता हो सकते हैं| जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ ऐसे पैरेंट्स की जो बच्चों की जरूरत और इच्छाओं के बीच फर्क नहीं करना चाहते क्योंकि उनकी जेब में अकूत पैसा है| जरूरत हर हाल में पूरी होनी चाहिए लेकिन क्या इच्छा पूरी होना भी उतना ही जरुरी है| मेरा जवाब है-नहीं| इच्छा का पूरा होना कतई जरुरी नहीं है| चाहे आपके पास कितना भी पैसा हो| जब हम इच्छा पूरी करन…

प्यार और तकरार के बीच से निकलता है ख़ुदकुशी से बचने का रास्ता

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यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी रहे हैं सुरेन्द्र कुमार दास| 2014 बैच का यह नौजवान इन दिनों कानपुर में एसपी के पद पर तैनात था लेकिन अचानक एक दिन कोई जहरीला पदार्थ खा लिया और अस्पताल पहुँच गए| तीन-चार दिन इलाज के बाद उन्होंने दुनिया छोड़ दी और हमेशा के लिए अनंत यात्रा पर निकल पड़े| बलिया निवासी सुरेन्द्र दास की पत्नी कानपुर में ही डॉक्टर हैं| वे इन दिनों मास्टर्स कर रही हैं| सामान्य परिवार से आते हैं सुरेन्द्र| स्वाभाविक है पढने-लिखने में तेज थे तभी तो भारतीय पुलिस सेवा से जुड़ सके| बड़ी मेहनत और अरमानों से पाई होगी यह कामयाबी सुरेन्द्र ने लेकिन अब अचानक सब कुछ ख़त्म हो गया| जरा, सोचिए कि इस परिवार पर अब क्या गुजर रही होगी| कितने सपने संजो लिए होंगे परिवार के लोगों और रिश्तेदारों ने लेकिन आज सब ख़त्म| यह भी बहुत सामान्य बात है| जब घर का कोई नौजवान कामयाब होता है तो सपने देखना आम है| लेकिन यही नौजवान जब ख़ुदकुशी जैसा कदम उठा ले, जीवन से हार मान ले तो क्या कहा जाए? यह तो तय है कि फिलवक्त इनके जीवन में कोई ऐसी दुनियावी परेशानी तो नहीं आई होगी, जिसका ये आसानी से सामना न कर पाते| यह भी तय है कि कुछ न …

इस ज्योति का आत्मविश्वास तो देखिए, आप का नजरिया बदल जाएगा

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मेरे मित्र हैं हास्य कवि सर्वेश अस्थाना| वे बेहतरीन इंसान भी हैं| वे बच्चों की भलाई के लिए काम करते रहते हैं, इसलिए मुझे कुछ ज्यादा ही प्रिय है| हालाँकि, यह सम्मान एकतरफा नहीं है| वे भी मुझे लौटाते ज्यादा हैं| वे प्रति वर्ष की तरह इस इस साल भी बाल उत्सव का आयोजन कर रहे हैं| इस उत्सव में बच्चों की भांति-भांति की प्रतियोगिताएं होती हैं| उन्हें पुरस्कार दिए जाते हैं| लगभग दस दिनी यह आयोजन लखनऊ में ठीक से जाना भी जाता है| इस आयोजन में मेरा भी जाना हुआ| जो मैंने देखा, महसूस किया, उसे ही आपके सामने परोस रहा हूँ| बड़ा गौरव महसूस हुआ| 29 अगस्त,2018 की बात है| बाल उत्सव में दृष्टि बाधित बच्चों का कार्यक्रम तय था| शहर के तमाम बच्चों की प्रस्तुति होनी थी। बच्चे अपने अभिभावकों के साथ एक-एक कर चले आ रहे थे। इसी क्रम में 10- वर्ष की एक ख़ास बच्ची आती हुई दिखी| यह बहादुर राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह के बाहर सीढियां चढ़ने का प्रयास कर रही थी| उनका आंकलन कर रही थी| तभी सर्वेश जी उस बच्ची की मदद के इरादे से पहुँच गए| उन्होंने आवाज दी, बेटा मैं तुम्हारा हाथ पकड़ लूँ। इस मासूम ने कहा-नो थैंक्स अंकल, मैं सीढियां…

अगर आपकी कहानी कोलकता की पारुल से मिलती है तो ये रहा समाधान

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कोलकता से हैं पारुल| इस हफ्ते इन्हीं की चर्चा| उनकी समस्याओं और समाधान की बात| गरज यह कि आप भी पढ़ें और अगर ऐसा लगता है कि पारुल की कहानी आपसे मिलती-जुलती है तो आपके लिए यह एक रास्ता भी हो सकता है| पारुल विज्ञानं की स्टूडेंट हैं| उनके पास पोस्ट ग्रेजुएशन की दो डिग्री है| उन्होंने कम्प्यूटर सेंटर खोला, नहीं चला| कुछ इम्तहान दिए, सफलता नहीं मिली| शादी-शुदा पारुल को लगता है कि उन्होंने पति का पैसा खराब कर दिया| अब वे हर हाल में सब भरपाई करने के इरादे से केन्द्रीय लोक सेवा आयोग की परीक्षा देने का मन बना चुकी हैं| किताबें खरीद कर घर आ चुकी हैं| लेकिन पारुल फिर से दोराहे पर खड़ी हैं| पूछती है कि यह मेरे लिए अच्छा है या बुरा, मैं समझ नहीं पा रही हूँ| पारुल को हर हाल में एक अदद सरकारी नौकरी चाहिए, जिससे वे परिवार की मदद भी कर सकें और अपना खोया हुआ आत्मविश्वास भी वापस पा सकें| अपनी समस्या पारुल ने मुझे व्हाट्सएप पर लिखी है| उनकी टाइम लाइन बताती है कि पारुल मेहनत भी कर रही हैं क्योंकि देर रात तक जागकर पढ़ाई करना उनकी आदत में शुमार है| मैंने पारुल से यही कहा कि आप काबिल हैं| पढ़ाई की है तो कन्फ्यूजन …

इच्छा और जरूरत के बीच से ही निकलेगा खुशी का रास्ता

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इच्छा और जरूरत के बीच से ही खुशी और गम का रास्ता निकलता है। ऐसा मैं नहीं, हमारे मनीषियों ने कहा है। इस बात को जब बच्चों की दृष्टि से देखें तो यह और महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर हम अपने बच्चों में इच्छा और जरूरत को समझने की समझ पैदा करने की कोशिश शुरू से करें तो आगे का उनका जीवन बहुत आसान और खुशहाल हो जाएगा, ऐसा मैं बहुत भरोसे से कह पा रहा हूँ।
अब आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि इच्छा और जरूरत के बीच के फर्क को बच्चों को समझाएं कैसे? आपके पास चाहे जितना पैसा हो या फिर आप कितने भी गरीब हों, बच्चों की जरूरतों का ध्यान हर हाल में रखा जाना चाहिए और दुनिया का हर माँ-बाप ऐसा करते भी हैं। इच्छाओं की पूर्ति जो माता-पिता करते हैं, वे आगे पश्चाताप करते हैं लेकिन तब चीजें उनके हाथ से निकल चुकी होती हैं। क्योंकि इच्छाएँ असीमित हैं और जरूरतें बहुत सीमित। अगर हमारे बच्चे को यह महसूस होता है कि थोड़ी सी जिद के बाद मम्मी-पापा उसकी कोई भी इच्छा पूरी कर देंगे और आपने ऐसा कर दिया तो तय मान लीजिए कि आप अपने बच्चे से आगे की खुशी छीन रहे हैं। वह आए दिन आपसे जिद करके अपनी हर इच्छा पूरी कर लेगा। फिर उसके सामने …

देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत

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महँगी शिक्षा और गुणवत्तापरक शिक्षा में क्या फर्क है? लोग क्यों महँगी शिक्षा को ही गुणवत्तापरक शिक्षा मान रहे हैं? यह सवाल मेरे सामने एक नौजवान ने उछाला है| जो देश के लिए, समाज के लिए कुछ करना चाहता है| इन्हीं दो सवालों के बीच में उलझा यह नौजवान समझना चाहता है कि आखिर सच क्या है? और वह किसे सच माने? सवाल बहुत वाजिब है और मौजू भी| मेरा मानना है कि हर महंगा संस्थान जरुरी नहीं है कि वह गुणवत्तापरक शिक्षा दे पा रहा हो| लेकिन इससे पहले समझना जरुरी है कि आखिर गुणवत्तापरक शिक्षा है क्या? क्या स्कूल की बड़ी वाली वातानुकूलित बिल्डिंग, नित नए बदलते ड्रेस, जूते-मोज़े, रोज बदलते कापी-पेस्ट कोर्स के माध्यम से हम अपने बच्चों को गुणवत्तापरक शिक्षा दे सकते हैं या गुणवत्तापरक कोर्स से? मेरा जवाब होगा, गुणवत्तापरक कोर्स| बिल्डिंग कैसी भी हो| ड्रेस कैसा भी हो लेकिन अगर कोर्स अच्छा है, व्यावहारिक है, उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षक अच्छे हैं तो बच्चों में गुणवत्तापरक कोर्स की समझ भी विकसित होगी और वे देश को चलाने की क्षमता भी रख सकेंगे| यह तभी हो पाएगा जब हम एक बड़े दायरे में सोचेंगे| बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित …

स्तन पान के लिए सप्ताह, दिवस या विज्ञापन की जरूरत क्यों?

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आज स्तनपान की बात| विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर सरकारें और ढेरों समाजसेवी संगठन इस मसले पर बात करते आ रहे हैं| अख़बारों में विज्ञापन, टीवी पर भी स्तनपान का प्रचार होते देखा जा रहा है| मैं प्रचार का विरोधी नहीं हूँ लेकिन समझने का प्रयास जरुर करता हूँ कि आखिर, इसके प्रचार की जरूरत क्यों पड़ी? निश्चित तौर पर कोई न कोई फीडबैक ऐसा होगा प्रचार करने, कराने वाली एजेंसियों के पास, तभी तो करोड़ों रुपए केवल इस मद में खर्च हो रहे हैं| आदि काल से यह स्थापित सच है और सर्वविदित है कि माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम उपहार है| मैं डॉक्टर नहीं हूँ लेकिन तजुर्बे के आधार पर कुछ तथ्य शेयर कर रहा हूँ| 1980 तक जो बच्चे पैदा हुए उनकी सेहत और उसके बाद पैदा हुए बच्चों की सेहत में जमीन-आसमान का अंतर है| गाँव और शहर के बच्चों में अक्सर फर्क देखा जा सकता है| पहले माँ बच्चे को दूध तब तक पिलाती थीं जब तक दूध बनता था| माँ को दूध बने, इसके लिए अतिरिक्त प्रयास किए जाते थे| खान-पान ठीक किया जाता था| नवजात बच्चे की माँ का ध्यान ससुराल से लेकर मायके तक रखे जाने की व्यवस्था थी| व्यवस्था अभी भी है लेकिन अब यह फिल्मों की तरह…