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मुलायम ने 38 नाम अखिलेश को दिए, सपा में सब कुछ सामान्य !

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हम साथ-साथ हैं..कुछ ऐसे ही संकेत दे रही यह तस्वीर: साभार यह बात धीरे-धीरे साफ होने लगी है कि मुलायम परिवार फिर से एकजुट होकर चुनाव लड़ेगा. बताया जा रहा है कि मुलायम सिंह यादव खुद अखिलेश का साथ देने को तैयार हैं. शिवपाल यादव को भी उन्होंने ऐसा ही करने को कहा है. बताया जाता है कि चाचा शिवपाल भी देर-सबेर अखिलेश के साथ काम करने को तैयार हो जाएंगे. मतलब, सपा में अब सब कुछ पहले जैसा दिखाने की कोशिशें भी होंगी. पर, लगता नहीं है कि चीजें पहले की तरह हो पाएंगी. क्योंकि इस पूरे सीन में शिवपाल यादव की स्थिति ही सबसे ज्यादा ख़राब हुई है. कहा जा रहा है कि मुलायम सिंह भतीजे आदित्य को आगे बढ़ाने के नाम पर शिवपाल को भी अखिलेश के पक्ष में तैयार कर लिया है. वैसे भी शिवपाल बिना मुलायम के चलने के आदती नहीं हैं. चुनाव आयोग के फैसले के बाद अखिलेश, पिता मुलायम सिंह से दो बार मिल चुके हैं. मुलायम ने मुलाकात के दौरान बेटे अखिलेश को 38 उम्मीदवारों के नामों की लिस्ट सौंपी है जिसमें शिवपाल यादव के बेटे आदित्य का नाम भी बताया जा रहा है. यह भी पता चला है कि अखिलेश अपनी लिस्ट में इनको जगह दे सकते हैं. मंगलवार क...

इस विधान सभा चुनाव अहम भूमिका निभा सकती हैं डिम्पल

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सांसद डिम्पल पति अखिलेश यादव के साथ : फोटो साभार समाजवादी पार्टी का जो मौजूदा स्वरूप निखर कर आया है, उसमें यह तय हो गया है कि अखिलेश यादव ही नंबर एक हैं. दूसरे नंबर पर कोई भी हो सकता है लेकिन इस चुनाव अखिलेश की सांसद पत्नी डिम्पल अहम भूमिका अदा करने वाली हैं. अभी तक परदे के पीछे से काम करने वाली डिम्पल सपा का चेहरा हो सकती हैं. उन्हें प्रियंका गांधी के साथ चुनावी मंच पर उतारा जा सकता है. अखिलेश की गैरहाजिरी को भी वे पूरा करेंगी, ऐसी संभावना जताई जा रही है. माना जा रहा है कि इस चुनाव में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव खुद ही पार्टी के सबसे बड़े प्रचारक रहने वाले हैं. उनके बाद डिंपल यादव की भूमिका चुनाव प्रचार में काफी अहम होगी. कन्नौज से लोकसभा सांसद डिंपल यादव ने दो दिन पहले ही 39 साल पूरे किए हैं. अखिलेश यादव से उनकी शादी को पूरे 17 साल हो चुके हैं. राजनीति में उनकी एंट्री 2009 में तब हुई जब पति अखिलेश यादव द्वारा छोड़ी गई फिरोजाबाद सीट पर समाजवादी पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाकर उतारा. हालांकि डिंपल ये महत्वपूर्ण चुनाव हार गईं लेकिन तीन साल बाद 2012 में विधानसभा चुनाव लड़ने के लि...

ऐसी पटकथा सिर्फ मुलायम ही लिख सकते हैं !

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समाजवादी पार्टी में चल रही उठापटक अब लगभग समाप्त हो चली है. चुनाव चिन्ह और पार्टी अखिलेश की हो चुकी है. चाहने वाले अखिलेश को हीरो की तरह देख रहे हैं. पर, मेरी नजर में असली हीरो तो मुलायम सिंह यादव ही हैं. अखिलेश, केवल चेहरा. शिवपाल यादव, अमर सिंह को खुद तय करना है कि वे कहाँ रहना चाहते हैं. लेकिन इतना तय है कि अगर समाजवादी पार्टी में रहना है तो उन्हें अखिलेश यादव का नेतृत्व हर हाल में  स्वीकार करना होगा. पूरे घटनाक्रम पर सरसरी नजर डालें तो साफ पता चलता है कि पटकथा लेखक ने बुनावट अच्छी की है. एक अच्छे संगठनकर्ता मुलायम को छोड़ अचानक पार्टी के ज्यादातर विधायक, संसद सदस्य अखिलेश के पाले में चले जाते हैं. कैसे ? चुनाव आयोग में खुद जाकर भी मुलायम हार जाते हैं और बिना गए अखिलेश पिता से जीत जाते हैं. कैसे? आयोग अपने फैसले में साफ-साफ कहता है कि मुलायम अपने पक्ष में पर्याप्त सबूत नहीं दे पाए और अखिलेश ने सब दे दिया? कैसे? रामगोपाल को मुलायम पहले पार्टी से बाहर करते हैं, फिर अंदर और अगले ही दिन फिर बाहर कर देते हैं. राम्गोपाल के साथ जुर्म में बराबर के भागीदार अखिलेश को नेताजी क्लीनचिट द...

नितीश की सफल कहानी दोहराने का प्रयास करने को तैयार अखिलेश !

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क्या बिहार की कहानी दोहरा पाएंगे अखिलेश: फोटो साभार चुनावी मुहाने पर खड़े यूपी की तस्वीर अब धीरे-धीरे साफ होने लगी है. समाजवादी पार्टी का झगड़ा निपटने के बाद अब जो सूरत बनती हुई दिख रही है, उससे भाजपा और बसपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. अब यह भी लगभग तय हो गया है कि भाजपा मोदी तो बसपा मायावती और तीसरा गुट अखिलेश यादव के नाम पर चुनाव लड़ेगा. ऐसे में लड़ाई के रोचक होने की उम्मीद ज्यादा है. कई आकलन टूट सकते हैं. कोई भी नया आंकलन सामने आ सकता है.  हालाँकि, अभी मुलायम सिंह यादव की तस्वीर आम आदमी की नजर में साफ होना बाकी है. वे अखिलेश के पक्ष में चुनाव प्रचार करेंगे या फिर अलग से अपने प्रत्याशी उतारेंगे. जानकारों की मानें तो पूरा का पूरा खेल ही उन्होंने तय किया है, ऐसे में ज्यादा उम्मीद इस बात की है कि वे अखिलेश के पक्ष में चुनाव प्रचार कर सकते हैं. अपने समर्थकों को भी वे बेटे के पक्ष में जुटने को कह सकते हैं. इस बात की आशंका कतई नहीं है कि वे अलग से प्रत्याशी उतारेंगे. हाँ, उनकी लिस्ट के कुछ प्रत्याशियों के टिकट जरुर कट सकते हैं. क्योंकि कांग्रेस, लोकदल और अन्य छोटे दलों से समझौते की ...

भारतीय रिजर्व बैंक ले सकता है कुछ अहम फैसले, आप भी जानिए

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बजट पेश होने से पहले भारतीय रिजर्व बैंक कुछ महत्वपूर्ण फैसले ले सकता है. ये फैसले एटीएम से नकदी निकासी, कैशलेस ट्रांजैक्शन और कुल नकदी निकासी सीमा से संबंधित हैं.  8 नवंबर को पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा 500 रुपए और 1000 रुपए के नोट बैन कर दिए जाने के बाद 2000 रुपए और 500 रुपए के नए नोट बाजार में पेश किए गए. इन्हीं के साथ पुराने छोटे नोट (10, 20, 50, 100 रुपए) चलते रहे. नए नोटों की सप्लाई कम होने और मांग अधिक होने के चलते नकदी का संकट पैदा हुआ और सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए नकदी सीमा के लिए अपर लिमिट निर्धारित कर दी. करीब सवा दो महीने बाद अब कैश निकालने के लिए एटीएम के बाहर की भीड़ में हल्का फर्क देखा जा रहा है. नकदी निकासी की सीमा भी बढ़ाई जा चुकी है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरबीआई कुल नकदी निकासी की सीमा बढ़ा सकता है. विमुद्रीकरण के ऐलान के बाद जहां एटीएम से पैसे निकालने की सीमा 4,500 रुपए कर दी गई थी वहीं बाद में मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर बरकरार रहने के चलते इसे 2,500 रुपए कर दिया गया था. मगर इस सीमा को 31 दिसंबर 2016 को रिवाइज किया गया और 1 जनवरी 2017 से लागू न...

यह सच्चाई सबको पता होनी चाहिए, जिससे आगे...

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प्रतीकात्मक फोटो:साभार ये आंकड़े बहुत रोचक हैं और सबको पता होना चाहिए. दुनिया की आधी आबादी के पास जितनी संपत्ति है, उतनी ही संपत्ति दुनिया के कुल आठ लोगों के पास है, लेकिन इनमें भारत से कोई नहीं है. आक्सफेम के मुताबिक इस सूची में अमेरिका से छह, स्पेन, मेक्सिको से एक-एक नाम शामिल हैं. दावोस में मंगलवार से शुरू हो रही विश्व के राजनीतिक और आर्थिक विशिष्ट वर्गों की बैठक के एजेंडे में असमानता प्रमुख मुद्दा है. शुक्रवार तक चलने वाली विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक में करीब तीन हजार लोग शिरकत करेंगे. विश्व आर्थिक मंच की बैठक की शुरूआत से पहले, ऑक्सफेम ने कहा कि आठ व्यक्तियों के पास उतनी संपत्ति है, जितनी दुनिया की आधी आबादी के पास है और इससे हमारे समाजों में विभाजन का खतरा पैदा होता है. इन उद्योगपतियों के पास जितनी संपत्ति है, वह दुनिया के सबसे गरीब 3.6 अरब लोगों के पास मौजूद संपत्ति के बराबर है. उद्योगपतियों का चयन फोर्ब्स की अरबपतियों की सूची से किया गया है, जिनमें माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स, फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग तथा अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोज शामिल हैं....

सपा का चुनावी दंगल: बाप जीते या बेटा, कार्यकर्ताओं का हारना तय

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चुनावी मोड़ पर खड़े उत्तर प्रदेश में चल रहे सपा की सियासी लड़ाई में जीत पिता की हो या पुत्र की, हारेंगे कार्यकर्ता. क्योंकि जो भी झगड़ा बीते कई महीनों से सड़कों पर चल रहा है, इसे घर के अंदर ही निपट जाना चाहिए था. दुनिया का दस्तूर है. इतिहास गवाह है कि जब भी परिवार का झगड़ा सड़क पर आया, दूसरों ने फायदा उठाया. यहाँ भी वही होता दिखाई दे रहा है.  जानकार अभी भी मानकर चल रहे हैं कि सब कुछ ठीक हो जाएगा. लेकिन जो नुकसान सपा उठा चुकी है, उसकी भरपाई कैसे होगी? मुलायम सिंह के कहने से बात नहीं बनेगी कि पार्टी टूटने नहीं देंगे. अगर यह पार्टी टूटेगी, तो इसके लिए वे भी जिम्मेदार होंगे. शायद सबसे ज्यादा जिम्मेदार. वे चाहते तो बेटे को पार्टी सौंपते, संरक्षक की भूमिका में सम्मान से रहते. वैसे भी उन्हें मानना पड़ेगा कि अब उम्र हो चली है. अब के मुलायम इतने कठोर नहीं हैं कि एक दिन में 11 सभाएं कर सकें. स्वाभाविक है कि समय के साथ उन्हें भी चलना चाहिए. मुलायम या अखिलेश ने जो प्रत्याशी घोषित किये हैं, उनमें से कोई भी प्रचार काम मन से नहीं कर पा रहा है. सब कन्फ्यूज हैं. क्योंकि दोनों की सूची में एक बड़ी संख्...